Thursday, February 14, 2013

जिंदगी कैसी ये पहेली

( मूल मराठी कथा तथा अनुवाद -स्वाती ठकार)वि .सू.-यह एक काल्पनिक कथा है अगर कहीं पात्र घटना तथा नाम में साधर्म्य मिले तो योगायोग मात्र !)


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मैं रोज की तरह पार्क में अकेली बैठी थी .इर्द गिर्द बच्चे खेल रहे थे .बेंचों पर बैठे बड़े बूढ़े  अपने बच्चों या नातियों को अपने वहीँ पर मौजूद होने का बीच बीच में अहसास दिलाते थे .एक मैं ही थी ,जो उनपर बराबर नजर रख कर ,उनकी छोटी सी छोटी हरकत भी गौर कर रही थी .वहां मेरे अपने बच्चे नहीं थे .मैं ,उनकी माँ की उम्र का टप्पा पार कर चुकी थी और दादी की उम्र तक पहुँचने में कुछ साल बाकी थे ,सो उनके खेल का बराबर मजा ले रही थी .कोई झूले पर झूल रहा था .कोई सी - सॉ पर वजन आजमा रहा था .कोई फिसलने के लिए घसरगुंडी ( स्लाइड ) तक जा कर डर के मारे पीछे हट रहा था .हर तरफ चहल पहल ,भागम भाग थी .

मेरी नजर अचानक एक बच्ची पर जा कर कुछ ठहर सी गई .तीन साढ़े -तीन फूट उंचाई ,तबियत हट्टी कट्टी थी .छोटी बच्ची के कोई निशान नहीं थे .लेकिन उसके खेलने का तरीका चार साल की बच्ची का था .अकेली खेल रही थी .मुझे अजीब सा लग रहा था .सोचा शायद मतिमंद या गतिमंद होगी .दूर बेंच पर उसके दादा या नाना बैठे  थे .उसे एक टुटा हुआ कंचा मिल गया .दादाजी को दिखाने के लिए वो दौड़ पड़ी .


सात आठ साल की बच्ची को टूटे हुए कंचे  में क्या दिलचस्पी होगी ?मुझे मेरी कहानी का पात्र मिल गया .मैं लेखिका थी  काल्पनिक पात्रों की अपेक्षा जीवंत पात्रों में ज्यादा रूचि थी .मनोवैज्ञानिक ,आदर्श वादी, यथार्थ वादी ,प्रयोगवादी सारे किरदार जीवंत पात्रों में मौजूद रहते है.उम्र के इस पड़ाव पर थी जहाँ डायबेटिस, बीपी जैसे साथी इर्द गिर्द मंडरा रहे थे .इनसे उलझने की अपेक्षा  घूमना फिरना लिखना आदि गतिविधियों में व्यस्त रहने की सलाह घर में सब दे रहे थे. सोचा ,पार्क में कहानी के लिए नया किरदार मिल रहा है...क्यूँ दूर तक जाए ?

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दुसरे दिन मैं ठीक उसी समय पार्क में  गई .आज उसके साथ एक औरत आई थी .उसकी उम्र पचपन के आस पास की होगी .मैं उन्ही के बेंच पर जा कर बैठ गई .बच्ची हमारे इर्द गिर्द ही खेल रही थी .
मैंने बच्ची से पूछा ," अकेली क्यूँ खेल रही हो बेटा ?सी- सॉ पर खेलो ,वहां झुला है देखो ! जाओ ना !"
उसने गर्दन हिलाकर 'ना 'कहा.
" वह डरती है !" औरत ने जवाब दिया .
" इतनी बड़ी बच्ची ,अब तक डरती है ?"मेरा प्रश्न अनायास निकल पड़ा .
"वह छोटी ही है !...सिर्फ चार साल की है ? उस औरत ने मेरी तरफ देखकर कहा .
मेरी नजर का  आश्चर्य  वह झेल नहीं पाई.तुरंत बोली ...
" मेरी पोती है .....बेटी  की लड़की  ...!उसकी मां को  सातवा महिना चल रहा है इसलिए हमारे साथ रहती है .जब पैदा हुई थी तब दस पौंड की थी ....आजकल एक लाख बच्चों के पीछे सौ बच्चे ऐसे पैदा होते है ."
" ऐसे मतलब ?"मेरा प्रश्न तीर की तरह छूट चूका था .
"दिमाग उम्र के हिसाब से ....लेकिन शरीर  ऐसा बड़ा !...हमारा नसीब ...और क्या ?


शायद हर एक को इस प्रश्न का उत्तर देते देते नानी थक गई थी .उनकी आखों से आंसू  उनकी इजाजत बिना निकल पड़े .रोती हुई नानी को देखकर बच्ची उनके पास दौड़ी चली आई .मैं ,न सोच पा रही थी ,न बोल पा रही थी .मानो कुछ ऐसी  नुकीली चीज थी जो   गले में अटक गई  थी .न निगल सकती थी न उगल सकती थी .नानी ने बच्ची की पीठ पर थपथपाकर उसे  फिर  खेलने के लिए भेज दिया .एक अजीब सा मौन छाया था .बच्चों के खेल कूद में ,पत्तों की सरसराहट में ,हवा के साँय-साँय  चलते छाया मौन !...दिल दिमाग को चुभनेवाला मौन !!  

"डॉक्टर ने इसकी कोई तो वजह बताई होगी ?" मेरा प्रश्न यूँ निकला जैसे किसी खाली गहरे कुँए में से निकला हुआ ध्वनि हो .
" क्या पता ! लोग कहते है पहले गाय भैंस घास खाते थे .शाकाहारी थे .अब उनके  तैयार फ़ूड में अंडे वगैरह रहते है .दूध बदल गया है इसलिए ऐसा है ...क्या सच और क्या झूट भगवान जाने " गहरी सांस लेते हुए नानी बोली .

बातचीत से पता चला वह साढ़े तीन  साल  की न होने की वजह से के.जी स्कूल में भर्ती नहीं हो पाई थी .हम उम्र बच्चे उसे बड़ी समझकर दूर रखते थे .बड़े बच्चे उसके बचपने से तंग आते थे .इसलिए  नाना नानी को उसके साथ खेलना पड़ता था .

अब उसके खेल में एक और साथी बढ़ गया .मुझसे कहानियां सुनने लगी थी .मुझे हरदम कुछ न कुछ सुनाना चाहती थी .मेरी कहानी का जो पात्र मात्र थी उसने मेरे मन मष्तिष्क में प्रवेश किया था .उसे मति मंद या गतिमंद कैसे कह सकते थे ?वह तो बच्ची ही थी .दिमाग और उम्र से चार साल की बच्ची का बचपन इश्वर ने क्यूँ छीन लिया ? यह सवाल मुझे हर वक्त झंझोड़ता था .मेरे डॉक्टर मित्रों ने कई वजह बताई .सार्थ समाधान नहीं मिल रहा था .

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उस दिन वह नाना के साथ पार्क में आई थी .आते ही उसने मेरा कब्जा ले लिया .बड़ी खुश थी .मुझे लिपट गई .दोनों हाथ मेरे गालों पर रखते हुए नाचते हुए कहने लगी " मुझे छोटा छोटा भाई हुआ है ?इतनासा है ..तुम भी चलो ना देखने !"
मैंने नानाजी की तरफ देखा .उन्होंने कहा " कल पोता हुआ है .पाच  पौंड वजन है .माँ -बेटा दोनों ठीक है ...कल से उछल रही है ..छोटू को घर ले आयेंगे ..." गहरी सांस लेते हुए पलभर रूककर वो आहिस्ता बोले ," इसकी नानी अस्पताल में है .इसे घर में संभालते संभालते थक गया .ये भी बोर हो गई .इसलिए पार्क में ले आया .


उनके स्वर में नॉर्मल बच्चा पैदा होने की ख़ुशी पोता पैदा होने की ख़ुशी से ज्यादा झलक रही थी .जायज भी था .मुझे भी राहत मिल गई .पता नहीं क्यूँ लेकिन पिछले दो महीनों से उन की हर ख़ुशी और गम में मैं खुद को शामिल करती रहती थी .


अब वो रोज मुझे भाई के कारनामें सुनाने लगी .मां का दूध कैसे पीता है...हाथ पाँव कैसे हिलाता है ..छोटू की शीशी ,सू सू  भी उसके लिए एक टॉपिक था .उसकी साभिनय  बातें देखकर आजू बाजूवाले बड़ी दया की दृष्टी से हम दोनों की तरफ देखते थे .मैं सोचती थी  उन्हें चिल्लाचिल्ला कर बता दूं ..ये लड़की आपके बच्चों से भी उम्र में छोटी है ..हालात की शिकार है ..उसे ऐसे मत देखो ..उसे अपनाओ .अब मनू( मनाली ) मेरे घर तक पहुँच गई थी .वह मुझे एक ख़ास उद्देश्य दे रही थी.उसके साथ बिताया हुआ हर पल मुझे अगले दिन की नई कहानी की तरफ मोड़ता था .मैं सोचती थी ..कल मैं उसे ये कहानी सुनाउंगी .

कहानी सुनने के लए अब एक एक करके बच्चे बढ़ने लगे .मुझे' कहानीवाली काकू  ' की उपाधि मिल गई .मनू को साथी मिल गए .मुझे पता ही नहीं चला मेरा फ्रस्ट्रेशन , डायबेटिस  कहाँ चला गया .
अब न वो आती थी न उसके नाना नानी .मैंने सोचा शायद अपने मां और छोटू के साथ अपने घर  गई होगी .बाकी बच्चे और मैं अपनी मस्ती में मस्त थे .

दिन बीत रहे थे .अब बच्चों की दिलचस्पी कहानियों से खेल की तरफ दुबारा मुड गई थी .खेलते हुए बच्चे देखकर मैं भी खुश हुआ करती थी .

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कई महिने बीत गए. एक दिन उसकी नानी अकेली पार्क में आई.मुझे देखकर मेरे पास आकर बैठ गई  .मैंने मनू के बारे में पूछा .नानी की आँखें आंसूओंसे लबालब भर गई .कुरेदकर पूछने से उन्हों ने जो कुछ बताया ,मैं सन्न सी बैठ गई ........

पाच साल की बच्ची औरत बन गई थी .गर्भाशय सम्पूर्ण विकसित हुआ था .हड्डियाँ चौदा साल की बच्ची की तरह डेवलप हुई थी .एक बचपन वक्त से पहले ख़त्म हुआ था .मां अब बच्ची को नाना नानी के पास नहीं भेजती थी .उनकी उम्र हो गई थी .बच्ची में अब भी बचपना था .उसपर कौन ध्यान देगा ?...सही था .अब हर वक्त उन्हें चौकन्ना रहना पड़ता था. शरीर चौदा साल का ..उम्र और दिमाग पांच साल का !...कितना डरावना असंतुलन !!बच्ची को स्कूल नहीं भेजते थे .स्कूल वालों ने मां बाप को अपनी जिम्मेदारी पर भेजने की चेतावनी दी थी .


उसकी मां बीमार रहने लगी थी .एक मासूम बचपन हालात ने बेरहमी से कुचल दिया था .
निराशा ने मुझे घेर लिया .उनके प्रति मन में उठी सहानुभूति व्यक्त भी नहीं कर सकती थी . सहानुभूति ...बाँझ सी ...न उनकी समस्या का हल ढूंढ़ सकती थी ना उन्हें दिलासा दे सकती थी .मेरे जन्म गाँव में होती तो दस पांच खासम ख़ास  गालियाँ बककर खुद भी फ्रेश होती और माहौल को भी फ्रेश करा देती .लेकिन क्या करती ..? सांस्कृतिक शहर में निवासी जो थी. ऊपर से बुद्धिजीवी का चोला शौक से ओढा था  ,तो सहना ही पड़ेगा ..अजीब सी घुटन थी .


"इस पर कुछ नहीं कर सकते ?" मेरा  सवाल लडखडाता हुआ  नानी  के कानों पर जा गिरा .
वह चुपचाप बैठी रही .थोड़ी देर बाद थकी हुई आवाज आई ,"पांच -छे साल उसे घर में पढाएंगे ! क्या कर सकते है ?...वह बेचारी तो रोती है स्कूल जाने के लिए ...सहेलियों के साथ खेलने के लिए ..लेकिन कौन समझाएं उसे और क्या समझाए ?"
मेरे सामने ये करो ...ये ना करो की पाबंदियों में जखड़ी ,रोती हुई नन्ही सी मनू आ गई ..इफ्तिखार आरिफ का शेर कानों में गूंजने लगा

गुड़ियों से खेलती हुई बच्ची की आँख में
आंसू भी आ गया तो समंदर लगा मुझे
अजी समंदर कैसा महासागर कहिये .


" आप उसकी मां को समझाकर उसे  यहाँ लाइए .हम कुछ न कुछ करेंगे ." मैंने नानी को तसल्ली देने की कोशिश की .
" उसकी मां !....उसे किसी पर भरोसा नहीं है ..वह खुद बीमार पड़ गई  है .मनू को उसके पापा के पास भी बैठने नहीं देती ,हर वक्त बच्ची के पीछे पड़ी रहती है ..कितना समझाया उसे ?" नानी रुमाल आँखों को लगाकर रोने लगी .मनू की मां में आया हुआ बदलाव कुछ ज्यादा ही चिंताजनक लगा .

मैं ठिठककर वहीँ पर बैठ गई .एक समस्याने कितनी सारी समस्याओं को बढाया था .उसके बाद कई दिनों तक मैंने पार्क में जाना छोड़ ही दिया था ..डर की अदृश्य छाया ने मुझे घेर लिया था .डाय बेटिस डिप्रेशन से थायराइड, लो बीपी मिल चुके थे.

कई बार सोचा उसकी मां को मिलकर आऊं .लेकिन एक अजीब डर ने घेर लिया' क्या  सोचेगी वो?'मन ने फटकारा ,"तुम अपनी तकलीफों से पहले छुटकारा पाओ. बाद में सोशल वर्क करो .लेखिका ही बनो .वही ठीक है ."हाथ में कलम पकड़ने की इच्छा ने दम तोड़ दिया था .अब लिखना लगभग छोड़ ही दिया .लेखिका बनने निकली थी .बन नहीं पाई ..घर में मुफ्त की सलाह बटोर रही थी .'लेखक को आर के लक्ष्मण के कॉमन मन जैसा होना चाहिए .सबकुछ देखकर भी अनदेखा करना चाहिए ..'...अंतर्मन झंझोड़ने लगा ," तुम्हारे जैसे लेखक समाज के लिए कुछ नहीं कर सकते .रट्टूतोते की तरह बड़े बड़े भाषण दे सकते है .लेकिन तुम लोग भगोड़े हो ,पलायनवादी हो .तुम लोगों की सब से बड़ी मज़बूरी ये है की अपनी संवेदनाओं को तुम पूरी तरह दफना  भी नहीं  सकते .'

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समय ....! सबसे बड़ा हकीम !!...अब मनू पानी के बुलबुले की तरह कभी कभार याद आती थी .मैं फिर से पार्क में जाने लगी .फिर एक अजीब सी लड़की ने मुझे आकृष्ट किया. एक नन्ही सी ढाई तीन साल की बच्ची अकेली खेल रही थी .बड़े बूढों की तरह बातें कर रही थी .तेज तीखी आवाज में डांट रही थी .अकेली ही बडबडा रही थी ...मनू से मिलने के बाद मैंने बच्चों की  कद से उनकी उम्र का अंदाजा लगाना छोड़ ही दिया था.
वह अपने पापा के साथ आई थी .पापा किसी बुजुर्ग से बात कर रहे थे .मैंने उसे अपने पास बुलाया .उसे समझाते  हुए कहा ,"अकेली क्यूँ खेल रही हो ?बच्चों के साथ खेलो ना झूले पर ,सिसों पर बैठो ."
"सब मुझे धक्का देते है ,गिराते है !" उसने गाल फुला कर जवाब दिया फिर अपने पुराने खेल से जुड़ गई .
वह मेरे बाजु के बड़े पत्थर की टीचर बनी थी ,उसके डायलाग में उसकी टीचर का आभास हो रहा था ..शायद स्कूल में वो पत्थर का रोल करती होगी .....! होमवर्क वो भी ट्यूशन और क्लास दोनों का ,न होने से बेचारा पीटा जा रहा था .वह मेथ्स में डफर था ...इंग्लिश उसको बिलकुल आती नहीं थी ..अजी कैट का भी स्पेल्लिंग उसको आता  नहीं था ...वह सारा वक्त खेल कूद और मस्ती करता था ..ऐसे हालात में  उसका पीटा जाना    स्वाभाविक ही था .शायद स्कूल और ट्यूशन दोनों में एक ही टीचर होगी ...अब वो पत्थर रो रहा था .

" रोते क्या हो पागल !रोज की पढ़ाई नहीं करनी है ! सिर्फ मस्ती करता है .बड़ा  होकर  क्या बनेगा ?कल मम्मी को मेरे  पास लेकर आ !"
बेचारा पत्थर शर्म से झुक गया था .टीचर का मम्मी को बुलाना उसे कतई मंजूर नहीं था. बगैर बोले मार खाता जा रहा था.थकी हारी टीचर मेरे पास आकर बैठ गई .
"  स्कूल में जाती हो ?" मेरा सवाल .
"जाना ही पड़ता है ना ..क्या करे ?" उसने मुंह सिकुड़कर जवाब दिया .
कौन सा स्कूल ? " मैंने पूछा .
" एंजल्स पेराडाइज !" .बच्ची परियों के नंदनवन में पढ़ती थी .
कौन सी क्लास में हो
उसने एक दो तीन करके पाच उंगलिया दिखाई .
मेरा सर चकराने लगा .'हे प्रभु ,अब ये तुम्हारी कौन सी लीला है ?'
मैं स्तब्ध हताश सी बैठी थी .मैंने आँखे मूंद कर  बेंच की टेक ली .बच्ची मेरे बाजु में बैठ कर शायद मेरा ही परिक्षण कर रही थी अब बिस्कुट कुतरने की आवाज आने लगी .
" इसने परेशान तो नहीं किया ना आपको ?"मैंने आँखें खोली .उसके पापा मुझे पूँछ रहे थे .
" नहीं तो .थोड़ी स्ट्रिक्ट टीचर है .लेकिन बड़ी प्यारी बच्ची है आपकी !" मैंने हंस कर जवाब दिया .
" प्यारी ? शैतान की नानी है वो !अगले साल जब असली टीचर देखेगी तब पता चलेगा ."उन्हों ने उसकी तरफ प्यार से देखते हुए कहा .
" मैं समझी नहीं ?" मेरा संभ्रम स्पष्ट दिख रहा था .
" स्कूल में कहाँ जाती है ..मार्च में साढ़े तीन की होगी .तब केजी में जाएगी ." उसके पापाने उसकी सारी पोल खोल दी .मैंने दोनों हाथ जोड़कर उसे प्रणाम किया और उनको असलियत बताई .
" एक नंबर की झूठी  है  वो ...हमेशा दीदी से बराबरी चलती है ....उनके खेल में दीदी हमेशा टीचर रहती है और ये उसकी स्टुडेंट .दीदी सेकण्ड  स्टेंडर्ड में पढ़ती है   उसकी एक्झाम है... वो पढाई कर रही है .इसलिए आज यहाँ ये टीचर बन गई .आज मुझे छुट्टी है इसलिए मेरे साथ आई है .."उसके सिरपर टपली  मारते हुए उन्होंने पूछा ,
"क्यूँ रे बदमाश ! काकू को क्या बताया ?"
पापा की नजर से कौतुक टपक रहा था .उनके पीछे छुपकर वह मेरी तरफ आँखे मिटमिटाकर  हंस रही थी .मैंने उसे अपने पास बुलाया . एक खिलखिलाता बचपन मेरी तरफ आ रहा था .मैंने बाँहे पसारकर उसे समेट लिया .ख़ुशी की लहर मेरे रोम रोम में दौड़ रही थी .
मैंने उसे शेक हेंड करने का नया तरीका बताया .मेरी और अपनी उंगलिया तीन चार बार जोड़कर  बिलकुल वैसा ही शेक हेंड किया .और मेरे कान में आकर बोली .कल मैं आप की टीचर बनूँगी ..जरुर आना ."
मैंने तुरंत  ट्यूशन और स्कूल का होम वर्क करने का वादा किया . टीचर पापा के साथ फुदकती हुई अपने घर चली गई और मैं गुड गर्ल की तरह अपने घर की तरफ ...!'ये सब मैं जरुर लिखूंगी!' इस नई उम्मीद के साथ ...मन में गीत  गूंज रहा था

जिंदगी कैसी ये पहेली हाए
कभी ये हँसाएँ कभी ये रुलाए ..

स्वाती ठकार



--
Regards,
Swaty Thakar.

त्या दोघी

मानवी स्वभावाचे मला नेहमीच कुतुहल वाटत आले आहे.शालेय जीवनात ,महाविद्यालयीन काळात ,नंतर नोकरीच्या निमित्ताने ,नंतरच्या साहित्यिक प्रवासात अनेक माणसे पाहिली.माझ्या सुदैवाने बालपण खडकलाट सारख्या खेड्यात गेल्यामुळे  लहानपणापासूनचा प्रवास आगाऊ,भोचक असा विशेषणानी बहरून गेल्यामुळे माणसाना जवळून अनुभवता आले.
आज ज्या दोघींबद्दल मी सांगत  आहे त्या दोन्ही कथा नायिका मला मानवी नाते संबंधांचे अनेक कंगोरे उलगडून दाखवतात.मी तेव्हा ठाण्याला विद्याप्रसारक मंडळाच्या तंत्रनिकेतनात काम करत होते .कुर्ल्याला एस .टी क्वार्टर्स मधे राहात होतो .नुकतीच राहायला गेले होते..लोकलचे टाइम टेबल ,लोकल प्रवास याचे गणित जुळवत प्रवास सुरु होता.  कुर्ल्याहून ठाण्याला जाताना  विशेष गर्दी नसे .. माझ्यासोबतच गाडीत चिक्कुवाल्या ,टिकली कानातली विकणाऱ्या ,चिलीमिली वाल्याही चढत .सीट रिकामी असल्याने बऱ्याचदा या बायांशी ठाणे येईपर्यंत मनसोक्त गप्पाही होत .अशाच बायांपैकी एक सुनंदा ...30-35 वर्षाची असावी ..पण रापलेली काया काळा कुळकुळीत अवाढव्य सुटलेला  देह यामुळे जास्तच वय जाणवत होते .टिकल्या विकायची ...आमच्या गाडीने कल्याण पर्यंत जायची ...तिच्याशी खूपच गप्पा व्हायच्या .
एक दिवस  अशीच पावसाळ्याची गाडी  लेट धावत होती .सुनंदा एका तिच्याच वयाच्या काळ्याकुळकुळीत माणसाबरोबर आणि एका अठरा वीस वर्षाच्या काळ्या चुणचुणीत मुलीबरोबर एकाच वेळी भांडत होती. .ती मुलगी आणि तो माणूस कन्नडमधे बोलत होते आणि सुनंदा त्या माणसाशी कन्नड हेलवाल्या मराठीत बोलत होती. तो माणूस त्या मुलीला' तू सोबत घेऊन जा !'असे सुनंदाला सांगत होता ..ती त्याला 'तू हिला घेऊन घरी जा !'असे सांगत होती ...या वादात ती मुलगी रडकुंडीला आली होती ..गाडी आल्यावर त्या माणसाने मुलीला गाडीत चढवले हिने गाडी सुटता सुटता तिला खाली ढकलले...ती पोरगी फलाटावर धडपडून पडली.मला सुनंदाचा खुपच राग आला .  
"काय ग कळतं की नाही तुला !किती जोरात पडली ती पोरगी ?" मी जोरात ओरडले.
"मरू दे कुत्रीला ...!"टिकल्यांचा डबा माझ्या शेजारी आदळत ती म्हणाली
"कोण ग ती ...तुझी मुलगी ....?आणि तो माणूस कोण?"
"माज्या पोरीना ढकलीन व्हय मी ...?ती रांड माझी सवत आणि तो भडवा माझा नवरा ...!" आता माझ्यातील लेखिका पुढे पुढे सरसावली अणि माझ्या शेजारच्या बायका बिचकून मागे मागे गेल्या ...या सगळ्या शब्दांचीही सवय असावी लागते ना...!पहिलं तिला शांत केलं...आणि मग ठाणे येईपर्यंत पदरात तपशील पडला तो असा ...ती मुलगी त्या माणसाच्या बहिणीची मुलगी ....लहानपणीच( नवव्या वर्षीच ) तिचं या मामाशी आई आणि आजीनी लग्न लावून दिलं ....तिच्याशी त्यानं लग्न तर केलं.. पण जिला कडेवर घेऊन फिरला होता त्या भाचीशी  संसार करायचा टाळून कामाच्या निमित्ताने (बांधकामावर सेंटरिंग कामगार) मुंबईला आला .. 
सुनंदाशी सूत जमले लग्नही झाले ...दोन पोरी झाल्या ...छान संसार सूरु असतानाच ही पोरगी वयात आल्यावर माय लेकीनी ( आई सासू बहिण ....कोणतंही नातं जोडा )बालिका  बधूला याच्याकडे आणून सोडली ...'नांदव नाहीतर ढकलून दे गाडीखाली !'म्हणून बारकीला सोडून  गावी उस्मानाबाद कडे निघून गेल्या..नात्यानं तिचा मामाच होता ...बिचारा गाडीखाली कसा ढकलणार !...तीही रुळली इथं हिच्या पोरीना सांभाळू लागली ..संध्याकाळचा स्वयंपाक करू लागली ...तशी नित्य नेमे रोज रात्री या मुद्द्यावर भांडणं होतच होती .... याची बांधकामाची कामं बंद झाली होती ..त्यामुळे मी मुलीना संभाळतो ...वस्ती चांगली नाही ...ही तरूण पोरगी तू तुझ्या सोबत घेऊन जा  म्हणून  दोघींचा नवरा सुनंदाला गळ घालत होता ....
नेहमीच्या मिल्स ऐंड बून्स ,बार्बारा कार्टलैंड ,खांडेकर,फडके अगदीच  रोमांटिक  म्हणून चुंबन ,गाल आरक्त होणाऱ्या काकोडकर साहित्य वाचणाऱ्या मला सगळ्याची गम्मत वाटत होती ..एक दिवस अगदी उलट चित्र होते .नवरा बारकीला घराकडे ओढून नेत होता ...आणि ही मात्र तिला आपल्या सोबत खेचून आणत होती . 
गाडीत शिरल्या शिरल्या मी प्रश्न केला ..."का ग आधी तर हिला हाकलत होतीस  मग आजच कशाला एवढं प्रेम उतू चाललय ?" प्रेम ... डोंबल माझं...मुडदा उचलला हिचा ...म्हणून दाणकन तिच्या पाठीत एक दणका दिला ..तिनंही तिच्या झिंज्या ओढल्या ...मधल्या लेडिज डब्याला जोडूनच जेंटस् डबा असतो ...लोक ओरडायला लागले ..या  समोरासमोरच्या जागी बसल्या .घाटकोपर ते विक्रोळी नुसऱ्या एक मेकीकडे खाऊ की गिळू असे बघत होत्या ...मी कन्नड मधे बारकीला काय झालं म्हणून विचारलं ....
बरंच काही झालं होतं ..त्यालाही काम नव्हतं म्हणून तो घरी राहायचा ...हिनेही तिला सोबत ठेवले नसल्याने तीही घरी ......!वासना ही अतितीव्र शक्ती असते ...नाते बंधन सर्व भावभावनाना  दूर सारून ती पुढे सरसावते .बारकीला दोन महिने झाले होते ...ही ठाण्याला नेऊन तिचा गर्भपात करणार होती ....ठाण्यात उतरताच मागच्या डब्यातल्या  मामाबरोबर भाची पळाली....आता मात्र मला या कुटुंबा बद्दल विलक्षण कुतुहल वाटू लागले ..
बारकीला मुलगा झाला ...हिच्या पोरीना भाऊ मिळाला ...बारकी घरी तीन पोरं संभाळू लागली ...ही देखील 'अजून होऊन होऊन काय वाईट होणार!' म्हणत रेल्वेत टिकल्या विकत धंदा करत होती .....तो पोरगा सहा महिन्याचा झाला ...सुट्टीत हिच्या पोरी तो पोरगा ...टिकल्या विकणारी ही आणि चिक्कु घेऊन बारकी असे अख्खे कुटुंब आमच्या गाडीला असे ...पोरी भावाला संभाळत ...जेव्हा पोरींची शाळा असे तेव्हा  सुनंदा बारकीचे पोर सांभाळत टिकल्या विकत असे ..कारण तिला पोर आणि चिक्कुची टोपली दोन्ही घेणे जमत नव्हते. कधी कधी दोघी धंदा करायच्या आणि ठाण्यापर्यंत ते काळेकुळकुळीत ,गुबगुबीत ,चुणचुणीत पोर माझ्या मांडीत ऐसपैस पसरायचे ....आजही गोपाळकृष्ण म्हटले की ते पोर दिसते ...डोक्याला झालरीची  कुंची ,झबले ,काळाकुळकुळीत तीट गालावर कपाळावर हनुवटीवर ....येता जाता दोघी त्याच्या गालाला हात लाऊन आल्याबल्या  करत राहायच्या ...बऱ्याचदा कुर्ल्याला चढल्या चढल्या सुनंदाच्या ऐसपैस मांडीत ते पोर निवांत निजायचे ..मग चिक्कु आणि टिकल्या दोन्ही बारकीच विकायची ...एकदा तर दोघी मिळून तिसऱ्या चिक्कुवालीशी भांडत होत्या

तो पोरगा दोन वर्षाचा असताना पाचव्या मजल्यावरून पडून नवरा मेला .....आठ दिवसात दुःख विसरून सुनंदा कामावर यायला लागली ..आता बारकी ( मोठ्या होत चाललेल्या )हिच्या पोरी आणि आपला मुलगा सांभाळण्या साठी घरी राहू लागली ..दरम्यान तिचे आईवडील आणि आजी गावी तिला न्यायला आले पण दोन सवतीनी दंगा करून प्लान उधळला ...सुनंदाची  वयात आलेली पोरगी सोबत देऊन त्याना गावी पाठवून दिलं
नंतर मीही पुण्याला शिफ्ट झाले ...पण आजही जेव्हा मी या दोघींचा विचार करते तेव्हा अनेक प्रश्न मनात घोंगावतात .रक्ताचे नाते श्रेष्ठ की मानलेले .... दोन बायका इतक्या विभिन्न भाव भावनानी कशा काय जोडल्या जातात .....शेवटी नाती वगैरे यापेक्षा नर आणि मादी हेच नाते खरे की काय .......?एक मात्रं झालं चांगलं -वाईट,काळं-गोरं,दुष्ट -सूष्ट असं काहीच स्थायी  नसतं   एवढं मात्र पटलं ...आज कदाचित त्यांच्या पोरींची लग्न झाली असतील ...पोरगाही कुठेतरी कामाला चिकटला असेल ...आणि या दोघी ....टिकली, चिक्कु ची टोपली फिरवत गाडीत फिरत...असतील ...कधीतरी त्या गाडीला जाऊन  त्या दोघी भेटतात का हे पाहावं वाटतय !☺☺☺
स्वाती ठकार

बेबीज डे आऊट

“श्वेता ,हे घे तुझं प्रोग्रेस कार्ड ..उद्या मम्मीला घेऊन ये .तू फक्त ड्राइंगमधे आणि वर्क एक्सपिरियन्स मधे पास  झालीयस ...बाकी फेल आहेस ...आय मस्ट टाक टू युअर ममा ...!”डिसोझा टिचर श्वेता बेबीवर जोरात खेकसली ...तशी ती एकदम दचकली ... टिचरच्या ओरडण्या पेक्षा मम्मी कशी भडकेल हे आठवून ती जास्त भेदरली ..

“मिस, मम्मी नको ..बाबाला घेऊन येऊ ..?ती बिचकत म्हणाली  .

“ नो श्वेता, मम्माशीच बोलावं लागेल मला !” डिसोझा टिचरने बेबीचं प्रपोजल  झटकून टाकलं  ....
सिनियर केजी संपवून बेबी जशी पूर्णवेळ पहिलीच्या वर्गात आली तशी ही शाळा म्हणजे बाबाने सांगितलेल्या गोष्टीतील बंद किल्ला आणि डिसोझा टिचर म्हणजे मुलाना मटामटा खाऊन टाकणारी  दुष्ट चेटकीण वाटायला लागली . तिला लिहायला आवडत नव्हतं गणितं नकोसं वाटत असे ...फक्त ड्राइंग आणि वर्क एक्सपिरियंसच्या टिचर आवडायच्या... पण त्या थोडावेळच येत .

सकाळीच मम्मा ओरडली होती“...बेबी ,आज प्रोग्रेस कार्ड मिळेल ..बघू काय दिवे लावलेत ते ....!जर फेल झालीस तर टीवी एकदम बंद ... तुला हास्टेलमधेच टाकते की नाही बघ ...!उठ सूठ कार्टून बघत असते कार्टी ....आमच्या बँकेतल्या शिपायाच्या मुलाला  दहावीला  90 टक्के मार्क मिळाले ...ज्याच्याकडे नसतं ना त्यालाच कळतं .... !”

बेबी मात्र शाळेत येईपर्यंत टक्के ...टक्के बडबडत येत होती ...तिला हा शब्द खूप आवडला होता ..ती मामाकडे गुहागरला सुटीला गेली तेव्हा तिथल्या वाडीतल्या रेशमाबरोबर ती खेळायची तेव्हा “ का ग रेश्मा टक्का दिला ...?कोण म्हणतो टक्का दिला..?.बेबी म्हणते टक्का दिला ...?का ग बेबी टक्का दिला ?कोण म्हणतो टक्का दिला..?हा मस्त खेळ आठवला ..

पण आता हातातलं रिपोर्ट कार्ड तिला गोष्टीतल्या राक्षसा वाटायला लागलं ...तिला शाळा सुटुच नये वाटायला लागलं ...ड्राइंगची सोनम टीचर वर्गात आली तिनं बेबीचें ड्राइंग सर्वाना दाखवलं खूप कौतुक केलं तेव्हा बेबीला वाटलं सोनम टीचरला घरी घेऊन जावं आणि सांगावं “आमच्या  मम्मीला हे सगळं सांगा ना मिस..!”

पण तिला माहित होतं मम्मी फक्त रेड लाईनच बघणार ...बाबाचं तिच्यापुढं काही चालणार नाही ...त्या पेक्षा शाळेतच लपून बसुयात का ? नको रे बाबा ...दार बंद होईल ना ... !त्यापेक्षा शाळेच्या मागच्या बागेत बसू ...?पण रिक्षावाले काका शोधत राहतील ना ...!लपून बसु या ..पण आज शाळा हाफ डे आहे आणि बँकही अर्धीच ..म्हणजे आणायला मम्मीच येणार ...बापरे ...!”आता तिला जास्तच भीती वाटू  लागली ..चेटकिणीच्या जागची डिसोझा जाऊन तिथं  मम्मी आली ..तिला अजून धडधडायला व्हायला लागलं..

शाळा सुटताच...ती मागच्या गेटने लोंढ्यातून बाहेर पडली कडेकडेने घराच्या विरुद्ध दिशेने चालायला लागली ..घराकडे निघाली असती तर मम्मीनं  तिला शोधून काढलंच असतं ..आणि प्रोग्रेस कार्ड एका झटक्यात काढून  घेतलं असतं ...बापरे ....बेबी आठवून एकदम दचकली..तिच्या बाजूने एक काका जात होते ...ते एकदम  थांबले..

“काय झालं बाळा ! काय नाव तुझं... रस्ता चुकलीस का ?”श्वेता देशमुख तुझं नाव ना ...ते युनिफार्मवर चिकटवलेला बॅज वाचू लागले . ”बेबी, माहित नसलेल्या कुणालाही आपलं नाव नाही सांगायचं...!कुणाशीही बोलायचं  नाही  .लोक पळवून नेतात !आणि डोळे ,हात कापून भीक मागायला बसवतात ..!”तिला  कामवाल्या मीनाताईंनी सांगितलेलं आठवलं  ,,तशी ती पुढे जोरात पळाली आणि बाजुच्या कार्पोरेशनच्या बागेत शिरली ..एका झाडाजवळ जाऊन बसली..
....

 एवढ्यात तिथे एक पेरूवाला आला..मस्त पेरू होते ...पण तिच्याजवळ पैसेच नव्हते ना .....कशाला रस्त्यावरचे पेरू खायचे ...?पोटात दुखायला लागलं म्हणजे ? ...तिनं स्वतःला समजावलं...

एवढ्यात तिथं दोनतीन टारगट पोरं आली आणि पत्त्यांचा डाव मांडून बसली ..हरणारा पैसे देत होता ....’किती मस्त आहे हा खेळ ...पैसेच पैसे ...कितीही पेरू खा !’बेबी मनात म्हणते ....तेवढ्यात त्यांचे जोरजोरात भांडण मारामारी सुरु झाली ...बेबी तिथून पळाली आणि घसरगुंडीजवळ येऊन बसली ..पाठीला दप्तर लावूनच तीन चार वेळा वर खाली गेली ...दप्तर   कुणी नेले असते म्हणजे ! बरं होईल .....रिपोर्ट कार्डची पीडा तरी जाईल असे तिला क्षणभर वाटले पण मम्मी दूसरे नक्की मिळवेल आणि मग अजून भरपूर ओरडेल याचीही तिला खात्री होती ..

आईच्या ओरडण्या पेक्षा बाबा कट्टी घेईल याचे तिला जास्त वाईट वाटत होते ...आता संध्याकाळ व्हायला आली होती बेबी फिरून आणि खेळून कंटाळली...तिथल्याच एका गच्च झुडुपाजवळच्या बाकड्यावर दप्तर पोटाजवळ घट्ट  पकडून बसली ...हळूहळू पेंगू लागली ...तिथेच मुटकुळं करून झोपली ..

कुणाच्या तरी ओरडण्यानं तिला जाग आली .तिला कुणीतरी पटकन कुशीत घेतलं होतं ..तिनं डोळे किलकिले केले...आणि दचकली ... चेटकीणच होती ...“अग शोनू कुठंकुठं शोधायचं रे बबडू तुला ?....टिचर ओरडली माझ्या पिल्लाला ?आपण टीचरला सांगू पुढच्या परीक्षेत खूप अभ्यास करून छान मार्क आणू म्हणून !”
बेबीला कळेना... चेटकिणी रडतात म्हणून बाबानी ,सांगितलं नव्हतं .तिनं लख्ख डोळे उघडले ..टार्चच्या प्रकाशात बघते तर काय चेटकीण नव्हतीच ती तर तिची लाडकी मम्मा होती ....!आणि ती अजूनच तिच्या कुशीत शिरली ... 



स्वाती ठकार
(08-07-2011..14.20)










Saturday, January 19, 2013

जाड रवी

"स्वाती ,तुझ्याकडं ती जाड रवी आहे ती कुठून आणलीस ग?मलाही तशी हवीय  !खूप शोधली पण अशी मिळतच नाही ..डाळ मस्त  घोटली जाते तिनं " असे म्हणत डाळ घोटायला शेजारीण माझी जाड रवी घेऊन गेली .खरंच होतं ...त्या  रवीचा दांडा  जाडजूड असला तरी  ती अखंड होती आणि खालची घुसळण धारदार होती ..लोणी ही मस्त निघत असे .डाळ एकदम एकजीव घोटली जायची . शेजारीण निघून गेली ...मी मात्र रवीच्याच विचारात रमले .

अशीच एक रवी आईकडं होती ..माझ्या बाबानं (तुकाराम सुतारनं ) तिला जवळजवळ चाळीस वर्षापूर्वी बनवून दिली होती...दरवेळी माहेरी जायची तेव्हा माझा डोळा त्या रवीवर असायचा ..आई काही दाद देत नसे वर जखमेवर मीठ चोळत म्हणायची ," तुकारामनंच करावी अशी रवी !तो होता तेव्हाच चार-पाच बनवून घ्यायला पाहिजे होत्या .."आईच्या माघारी भावजयीकडून ती रवी मागून आणणं प्रशस्त वाटत नव्हतं .


आई गेल्यावर वडिलांसोबत माहेरी गेले होते .तेव्हा त्याना मी म्हटलं ,"काका, मला अशीच रवी बनवून हवीय .आता बाबाच्यात कोण सुतारकाम करतय ?त्यानी घरी निरोप धाडला .त्याचा धाकटा मुलगा अण्ण्या (नाव अर्जून...माझ्याहून आठेक वर्षानं लहान ) आला ...डोळे दारू पिऊन तारवटलेले. याच अण्ण्याला मी लहानपणी कडेवर घेऊन फिरत असे ..मधे बराच काळ तो दिसला नव्हता ..मला बघितल्यावर  मला' नमस्कार अक्का!' म्हणत हात जोडले.


तेवढ्यात आमचा वाटेकरी(शेतातला शेतकरी ) ,भाऊ ,आणि अण्ण्याचं चांगलंच जुंपलं ...एकंदर  मतितार्थ हा कि हे सुतार माजलेत .धान्य न्यायला वेळेवर येतात .काही काम सांगितलं तर मात्र टाळमटाळ ...अण्ण्याचं म्हणणं असं कि सुतारकाम करणं फार अवघड झालंय ...परवडत नाही ...एवढं ऐकल्यावर मी रवीचा नादच सोडला ...

जाता जाता त्यानं काकाना त्याला बोलावण्याचं  कारण विचारलं ..
घरातली रवी त्याच्या हातात देत मीच उत्तर दिलं " बाबारे ,ताईला ही  रवी जशी बाबानं बनवून दिली होती ..अगदी तश्शीच मला हवी होती...राहू दे घे ...सुतारकाम महाग झालंय... तुला तुझ्या कामात कुठं वेळ असतो .....? "कसला राजबिंडा पोरगा होता आणि काय अवतार झाला होता ...मलाच गलबललं." काय अवतार करून घेतलायस रे अण्ण्या ?कसला साजरा होतास ...आणि काय ध्यान झालंय आता तुझं ! "मी किंचित त्राग्यानं म्हणाले  पण सूरात त्राग्यापेक्षा  हळवेपणा जास्त असावा ...

तो गेल्यावर वडील सांगत होते ...गावातील सुतारकाम करणारी ही मुलं ट्रॅक्टर  यंत्र शेती,मिक्सर ग्राईंडर आल्यामुळं   गावात काम कमी झाल्यानं शहरात गेली .काहीजण  कंपन्यात काम करत होती ,काही फर्निचर करणाऱ्यांकडं असिस्टंट म्हणून ...व्यसनं लागली ..गिरण्या बंद पडल्या ...लोखंडी ,पावडर कोटेड फर्निचर वाढलं ..ही पोरं परत गावी आली ....जुने कसब उरले नाही ...व्यसन सुटायचे नाही ...ना घर के ना घाटके अशी स्थिती झाली .....मी विषण्णपणे हसत म्हणाले "य़ांत्रिकीकरणाचे दुष्परिणाम असा साहित्यसंमेलनातील परिसंवादाचा विषय होऊ शकेल नाही !"


मी रवीबद्दल विसरूनच गेले ..दोनेक दिवसानी मी गावाला निघाले ...सामान घेऊन बाहेर पडत होते  तेवढ्यात अण्ण्याची पिंकी धावत रवी घेऊन आली ....आणि धापा टाकतच म्हणाली " आत्या ,आमच्या  बाबानं तुला हे द्यायला सांगितलंया ...!" काका पैसे द्यायला लागले तर म्हणाली " आमच्या बाबानं ह्याचे पैशे घिऊ नको म्हून सांगितलया मला !  "म्हणून माझ्या भाच्यांसोबत खेळायला ती पळाली .
आईकडच्या  रवीपेक्षा ही खूपच सुबक देखणी तरी दणकट होती ...तिला ड्रीलने भोक पाडून अडकवायचीही त्यानं सोय केली होती ..मी काकाना म्हटलं आज ताई(आई ) असायला हवी होती ...मस्त चिडवता आलं असतं ...भाऊही आश्चर्य व्यक्त करत म्हणाला " भारी आहेस घे बाई तू ...ह्या अण्ण्यानं एवढी झकास रवी ती सुद्धा एक पैसा न घेता कशी काय बनवली कुणास ठाऊक ?" मी म्हटलं ,"जाऊ दे रे ....त्याची काय अडचण असते ते आपल्याला काय कळणार ? त्यांच्या वाटचं धान्य कोणत्याही अपेक्षे शिवाय त्याना दिलं जाऊ दे एवढं मात्र मनापासून वाटतं !"

आजही रवीच्या निमित्तानं राहून राहून  अनेक प्रश्न मनात  उठतात .. वाटतं ..का बरं त्यानं बनवली रवी माझ्यासाठी ?लहानपणीचे जुने दिवस त्यालाही आठवले असतील का ? त्याच्या बाबाचे आणि माझे भावनिक नाते त्याला आठवले कि  माझ्या त्या वेळच्या काळजीच्या शब्दानी हेलावला ? काहीही असो या निमित्ताने क्षणभर का होईना मीही हळवी होते हे मात्र खरे ...

स्वाती ठकार ...04.02.2012....1.15

महात्मा गांधी नावाचा महामिष्किल म्हातारा ☺☺☺

       मला गांधीना बघायचा योग आला नाही .पण बालपणीचा काळ गांधी द्वेष आणि ऐकीव बातमीवर गांधी विरोधात  पांडित्य पोसण्यात गेला.घरी वडील पक्के गांधीवादी आणि आई पक्की हिंदुत्ववादी (गांधी द्वेष्टी ) .मी हुबळीला शिकत असताना गांधींविरोधात  शेखी मारत होते .आमच्या शिक्षकानी मला गांधी कसे होते हे गांधी सहवासातील व्यक्तिंकडून जाणून घे असे सांगितले आणि रेड्डी म्हणून एक वयस्क गृहस्थ होते.त्यांच्याकडे शनिवारी जायची ड्युटी लागली .
       राव काका म्हणून माणसाचा बंगला होता .तिथे राव ,रेड्डी आणि भट असे तीन म्हातारे गांधीजीनी लोकाना पाठवलेली आणि लोकानी गांधीजीना पाठवलेली पत्रं होती त्यांचं संकलन करून पुस्तक काढण्याच्या कामाला सुरवात केली होती .तेच हल्लीचे 100च्या वर गांधी खंड आहेत .मी बापडी गांधी समजून घ्यायला गेले होते .त्या तीनही म्हाताऱ्यानी गांधी कसे आहेत हे न सांगता पोत्यातली पत्रं माझ्यापुढं ओतली आणि  भाषावार सॉर्टिंग करायला सांगितलं .

   पत्रं वाचताना उमजत गेलेले गांधी आणि ऐकलेले तथाकथित बुद्धीवाद्यानी व्याख्यानातून उलगडून दाखवलेले गांधी यात जमीन अस्मानांचं अंतर होतं .मनाशी नवीनच संघर्ष सुरु झाला .पत्रातून दिसणारे गांधी तसेच या माणसानी वर्णन केलेले गांधी म्हणजे एक महामिष्किल म्हातारा .ज्याची विनोदबुद्धी अफलातून आहे .लहानमुलांच्याही पत्राला त्यानी फार सुंदर उत्तर दिले होते .

   रेड्डी काकानी सांगितलेले दोन किस्से अफलातून आहेत .ते स्वतः शाळकरी वयाचे असताना आंध्रप्रदेशातून तेलगुखेरीज कुठलीही भाषा येत नसताना निव्वळ गांधीजींच्या जवळ राहायचे म्हणून त्याना पत्र पाठवून साबरमतीला रेल्वेने गेले .गांधीजीनी महादेवभाईना सांगितले होते या मुलाला तेलगुखेरीज कुठलीही भाषा येत नाही तेव्हा तुम्ही स्वतः त्याला आणायला जा .महादेवभाईनी ते काम तिसऱ्याला सांगितले ..तिसऱ्याने चौथ्याला ..कुणीच या मुलाला आणायला गेला नाही .सकाळी आश्रमात येणारा हा मुलगा दुपारी एक वाजता पोहोचला .गांधीजींच्या लक्षात आले .काकाना जेवायला खायला देऊन विश्रांती घ्यायला सांगितली आणि महादेवभाईना शांत स्वरात एवढंच म्हणाले जर वल्लभभाई  किंवा जवाहरलाल येणार असता तर स्वतः जातीनं गेला असतात .हा मुलगा जवाहरलाल इतकाच मला महत्वाचा आहे. 

एकदा खेडा जिल्ह्यातून काही शेतकरी तहसीलदाराच्या जुलुम आणि वाढीव साऱ्याबद्दल तक्रार करायला आले होते.त्यातला एकजण दर दोन शब्दामागे संतापाने  शिव्या देत होता .महादेवभाई अस्वस्थ झाले.त्यानी लोकाना त्याला बाहेर घेऊन जायला सांगितले .पण बापूनी त्याला थांबवून पुन्हा बोलतं केलं.सगळी पार्श्वभूमी समजावून घेतली .नंतर ते महादेवभाईना म्हणाले .त्याच्या शिव्या या त्याच्यावर झालेल्या अन्यायातून आल्या होत्या .ही साधी माणसं आहेत .त्याना संतापाच्या वेळी व्यक्तव्हायला उपयुक्त असणारे शब्द आहेत ते .तिथं भावना समजून घ्यायची असते .शब्दांचा कीस पाडत बसू नये.  

वल्लभभाईंची पत्नी अकाली गेली .त्यांची मुलगी ते गांधीजींच्याजवळ सोडून गेले.ती बापुंची खूप लाडकी होती .तिला रंगीत बांगड्या हव्या होत्या ,बापू रंगीत काचेच्या बांगड्या घालण्याच्या विरूद्ध होते .मोठ्या बायका रंगीत बांगड्या घालत नव्हत्या .पण त्या मुलीसाठी त्यानी रंगीत बांगड्या आणल्या .तेव्हा मोठ्या बायकानी याबद्दल विचारलं .ते म्हणाले तिच्या मनावर ताबा यायला काही काळ जावा लागेल . 

असे अनेक किस्से गांधीजींच्या बद्दल ऐकले .लहान मुलंही बापूंबरोबर भांडत असत .त्यांच्या सोबत फिरायला जात .चालण्याची शर्यत लावत .गांधीजींच्याजवळ  राहण्यासाठी आश्रमात विश्रांतीला गांधीवादी ,कम्युनिष्ट ,हिंदुत्ववादी ,दलित सर्वजण येत. गांधीजींबरोबर मनसोक्त भांडून ,वादावादी करून पुन्हा विश्रातीला येण्याची धमकी देऊन जात .असे होते गांधी .मी हल्ली गांधीविरोधातील लिखाण वाचून चिडत नाही .समर्थनार्थ युक्तीवादही करत नाही .कारण स्वतः गांधीजी जरी असते तरी त्यानीही बोळक्या दातातून मिष्किलपणे हसू सांडत म्हटलं असतं ,सचमुच मैं बहुत बुरा हूँ ...कुछ करना पडेगा ।
    स्वाती ठकार

सो स्वीट ना ...


“ मेघु ,आज संध्याकाळी शाळेतून येताना काळे काकुंच्या बागेतनं सोळा सोळा पत्री ,दुर्वा ,आघाडा  घेऊन ये .. हो आणि उद्या घरी ताईची मंगळागौर आहे.तिच्या सासरची मंडळी येतील संध्याकाळपर्यंत ..उद्या शाळेला येणार नाही म्हणून सांग पाटील मॅडमना ...संध्याकाळी हळदीकुंकवाला ही यायला सांग त्याना..काळे काकूना पण सांग ग ! ” वाळलेल्या कपड्यांचा भलामोठा गठ्ठा मेघनाच्या कॉटवर  आणून टाकत आई म्हणाली .

“ ए आई , हे सगळं ताईच्या खोलीत नेऊन टाक .आणि हो ..मी उद्या दांडी आजिबात मारणार नाही .उद्या गणिताची टेस्ट घेणार आहेत सर ....नवीन सर आहेत.. व्हेरी स्ट्रिक्ट  ..तुझं काय जातंय दांडी मार म्हणायला ! ” मेघना फणफणली.

तिला आईनं सांगितलेल्या कामातलं खरंतर एकही काम करायचं नव्हतं ....सगळे नुसते ताईच्या मागं मागं !..ही ताई पण पहिल्या पासून अशीच. कायम सगळं आयतं मिळवायची ..स्वार्थी आहे अगदी .स्वतःचं काही म्हणजे काही देणार  नाही.. मेकप बॉक्सला हातही लावू देत नाही ..स्वतःला करीना कपूर समजते .. मेघना मनात फणफणत होती .तसं तिचं आणि ताईचं कधीच जमलं नाही ..मोठ्या मानसीला छोटा भाऊ हवा होता पण झाली भांडकुदळ बहीण आणि मेघनाला मोठा दादा हवा होता पण आधीच ही बया आलेली ....त्यात वयात सात आठ वर्षाचं अंतर .कायम ताई मोठी म्हणून दादागिरी ...तरी बरं बाबा मेघुचे खूप लाड करायचे .मस्ती करायचे .तिच्याशी खेळायचे ..पण त्यांच्या कॉलेजला जेव्हा सुट्टी असायची तेव्हाच .पेपरचे गठ्ठे तपासायला आले की ती ते रुममध्ये गुडुप व्हायचे .

फक्त एवढ्याच कारणासाठी तिला ताईचा राग येत नव्हता .ताईनं तिचा सगळा प्लॅन ओम् फस केला होता . तिच्या रागाचं मुख्य कारण हे होतं की काळे काकुंच्या हँडसम  अमितवर तिचं प्रेम असताना तिनं त्याला सोडून आडदांड काळुंद्ऱ्या जिजूशी लग्न केलं . कितीतरी वेळा त्यांच्या नोटसची देवाण घेवाण तिनंच केली होती .जिजूशी लग्न का केलं? तर म्हणे अमित कंपनीत साधा इंजिनीअर आहे आणि जिजू असिस्टंट मॅनेजर! हे काय कारण झालं ..अरे ,झाला असता ना अमितपण मोठा मॅनेजर ..हिला मुळी धीरच नाही .

पूअर अमित,इतका स्वीट चॅप ,  ताईच्या लग्नानंतर  गेला अमेरिकेला .तिथेच राहणार आहे असं काळे काकू म्हणत होत्या .त्यानाही त्याची खूप आठवण येत होती ..बिचारा एकुलता एक मुलगा इतका दूर गेला .सगळं ताईमुळं झालं .प्रेमभंग फार वाईट रे बाबा !
खरंतर मेघुलाच  लग्न करायचं होतं त्याच्याशी... पण ताईचं प्रेम होतं म्हणून तिनं इतका मोठा त्याग केला होता .खरंतर आताही ती त्याला प्रपोज करू शकत होती. पण तिला सज्ञान व्हायला अजून तीन चार  वर्ष तरी लागणार होती .आणि सगळ्यात महत्वाचं म्हणजे हल्ली  हल्ली तिला नवीन आलेले गणिताचे संजू सर खूप आवडायला लागले  होते . कसले  हँडसम आहेत .. पण ...सो बोरींग.... सारखं ऋचाच्या हुशारीचं कौतुक करतात .

कालच स्पोर्टस् च्या तासाला  ते मेघुला उद्देशून हेडसराना म्हणाले होते ,” सर ही मुलगी रनिंगमध्ये एकदम छान आहे ..पण गणिताकडे आजिबात लक्ष देत नाही !” तेव्हाच मेघूनं ठरवलं आपले बाबा एवढे  मॅथ्सचे प्रोफेसर आणि आपण एवढे मठ्ठ ...आजिबात नाही ...आता मॅथ्स नंबर वन करायचं ...स्पोर्टस् मधे तर आहोतच ...मग काय !ऋचा आऊट… मेघू इन! मेघू, यू आर ग्रेट ! स्वतःची पाठ थोपटत ती गाणं गुणगुणत किचनमधे आली .बाबानी भुवया उंचावत खुणेनं विचारलं ,”आज काय स्पेशल !”
पण तिनं आपलं गुपित कुण्णालाच सांगायचं नाही असं ठरवलं होतं ...तेवढ्यात टेबलावरच काडवाती करत असलेली आज्जी खुद्कन हसली .मेघुनं जरा रागानंच तिच्याकडं पाहिलं ..
“ आज ताई येणार आहे ना ...प्रयोग वहीत आकृत्या काढून द्यायला ...मग काय आमचा गृहपाठ पूर्ण झालाच म्हणून समजा ! ”  ही आज्जी पण ना ...मेघू वैतागली पण लगेच तिनं  जीभ आपल्या दाताखाली ढकलत ,गाल फुगवत ,डोळे मिचकावले .
“अरेच्चा ,हे आपल्या कसं लक्षात आलं नाही !”
“ए आई ,मी शाळेतून आल्यावर कपड्यांच्या घड्या करते ..आणि हो येताना पत्रीही आणते हं हळदीकुंकवाचं अजून कुणाला सांगायचंय का ?नंतर  त्रास द्यायचा नाही.खूप अभ्यास आहे हं मला ! ”म्हणत आईनं करून ठेवलेला पोळी भाजीचा रोल तोंडात कोंबला .
“ अग सावकाश खा !”म्हणत  मागून आलेल्या आईचं काहीच ऐकून न घेता सायकल वर टांग मारली .

“ ही पोरगी म्हणजे एक तुफान आहे रे बाबा ! मी लिहून देते तुम्हाला ही एक ही काम धड करणार नाही !”
“नक्की करेल ”....बाबा
“बघाच तुम्ही .” .....आई
“अर्धवट नक्की करेल! तीनचार प्रकारच्या पत्री आणेल आणि एखादं आमंत्रण नक्की देईल ”… आजी  पदराआड खिदळत म्हणाली ...


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“काय ग आणली का पत्री वगैरे ! ”सायकल दाणकन आपटून घरात शिरणाऱ्या मेघुच्या मागे मागे जात आईनं विचारलं ..
“तुझं तूच आण सगळं ..मी काही काम करणार नाही  तुझं !”म्हणतं ती ताडताड खोलीत निघून गेली आणि खोलीचं दार  धाडकन लावलं ...उशीत डोकं खुपसलं आणि मुसमुसू लागली ..तसंच कारण होतं ना ! तिला वर्गात  मोनूनं सांगितलं कि संजू सर फक्त दोन महिनेच शिकवणार आहेत .ते युपीएससी परिक्षेत पास झालेत ...त्यांचा साखरपुडा झालेला आहे . ते लग्न करूनच ट्रेनिंगला जाणार आहेत “ हेच करायचं होतं तर आले कशाला शिकवायला !”
“ काय म्हणतात तुझे संजू सर !” आजीनं विचारताच ..ती एकदम भडकली ,या आजीला ना काही म्हणजे काही सागितलं नाही पाहिजे .
“माझे कुठलं ...माझे म्हणे ...आणि हे बघ सारखं चिडवायचं नाही हं मला ...काही खास नाहीत एवढे ते ... हो आणि ते आता  जाणार आहेत बरं का ! काढून टाकणारेत त्याना दोन महिन्यात ..जोग सरच छान शिकवत होते ..तेच आम्हाला गणित शिकवणार आहेत ..”
तिन्हीसांज होता होता ताईच्या सासरचे सगळे आले .जिजू रात्री येणार होते ..घरात एकदम धमाल सुरू झाली .मेघूनं शहाण्यासारखं सगळं सामान नीट लावलं ..काळे काकूनी सदुकडून दूर्वा पत्री काढून ठेवली होती . सायकलला टांग मारून तिला फक्त घेऊन यायची होती .

सगळे खूप आनंदात होते... पण ते तिच्यापासून काहीतरी लपवत होते .स्वयंपाक घरात खूसखूस सुरू होती  ..ताईचे तर केवढे लाड सुरू होते ...

मेघुच्या खोलीत ताई आली तेव्हा मेघू आईनं केलेल्या कपड्यांच्या घड्या टेबलावर नीट रचत होती .ताई मेघू जवळ आली .आपल्या पर्समधलं नवं कोरं मेकअप कीट तिला काढून दिलं आणि म्हणाली ,” हे जिजूनं खास तुझ्यासाठी आणलंय दिल्लीहून! ” तिचा गालगुच्चा घेत ताई म्हणाली.
“ आता एकदम गुड गर्ल व्हायचं बरं का !तू मावशी होणारेस ..कळलं का बाई ! ”
मेघु बघतच राहिली ..आत्ता तिला कळालं ताई का फार्मात आहे ते !. अरेच्चा म्हणजे मी मावशी होणार तर  !..तिनं ताईच्या पोटाला अलगद हात लावला आणि दोघी  खुदु खुदु हसायला लागल्या .
“ ए ताई मी पटकन माझ्या सासरी जाऊन दुर्वा पत्री घेऊन  येते ” तिच्या कानाशी कुजबुजली तसा ताईनं नाटकीपणानं कपाळाला हात लावला  आणि हसायला लागली .

काळे काकुंकडे ओल्या नारळाच्या करंज्या खाऊन,छान गप्पा मारल्या .त्याना दारात छान रांगोळी काढून दिली.भांडी सेल्फवर लावून दिली .काकूनी प्रेमानं तिच्या गालावरून आपली बोटं फिरवून कपाळावर नेऊन कडाकडा मोडली .तशीही  मेघूच  ताईपेक्षा काकूंची लाडकी होती . त्याना हळदी कुकंवाचं सांगून फुलं  पत्री वगैरे सामान घेऊन ती आनंदानं घरी आली .आज काकू किती  खुश होत्या ..!अमित दिवाळीत महिनाभर सुट्टी काढून येणार होता ना !

रात्री ताईजवळ झोपलेल्या  मेघूच्या स्वप्नात  जिजू ,थोडं काळं थोडं गोरं गुबगुबीत बाळ ,आई ,बाबा ,सगळे आलटून पालटून येत होते ...हो आणि अमेरिकेहून तिला खास मागणी घालायला अमितही आला होता जीजूपेक्षाही छान छान गिफ्टस् घेऊन   ...
स्वप्नात ....

सो स्वीट ना !
स्वाती ठकार (दि.31-12-12 ...दुपार 12.45)





Wednesday, December 15, 2010

संपली माझी गोष्ट

एकदा अशाच एका संस्कारवर्गात प्रमुख पाहुणी म्हणून गेले होते .काय मजा आली म्हणून सांगू !सगळी बालप्रजा ही आदल्या वर्षी बाल गटात वय बसत नसल्याने शाळांनी नाकारलेली आणि संस्कार वर्गाने संस्कार करण्यासाठी आनंदाने स्वीकारलेली होती .लहानमुले मला जरा जास्तच आवडत असल्याने प्रमुख पाहुणी पेक्षा त्यांच्या हालचाली निवांत पणे न्याहाळाव्यात म्हणून जरा आधीच जाऊन बसले .वर्गाचे दार बंद होते .संचालिका यायच्या होत्या .मी तिथेच एका झाडाजवळ बसले.

मला संचालीकेशिवाय कोणीच व्यक्तीशः ओळखत नसल्याने मी निवांत पणे बालगोपाळ पाहू लागले .कुणी सॉक्सशी चाळे करत होता .कुणी खिशातून आणलेले पिक्सो ,बारक्या गाड्या मित्रांना दाखवत होता .इवल्याशा चिमण्या मस्त चिवचिवत होत्या .आलेले पालक आपापल्या बाळांना आवरायचा शिस्त लावायचा प्रयत्न करत होते .ही बाळं त्यांच्या भोवती ही धुडगूस घालत होती .तेवढ्यात बाई आल्या आणि मुलं एकदम चिडीचूप झाली ...आता मात्र संस्कार धो धो वाहायला लागले .

बाईनी माझी ओळख करून दिली आणि त्यानंतर मुलांचे विविध गुण दर्शन सुरु झाले .हे गुणदर्शन म्हणजे उपस्थित पालकांना वर्षभरात आपला मुलगा किती गुणवान झाला आणि शिक्षकांना याची देही याची डोळा आपण पेरलेले संस्कार उगवताना ,फोफावताना बघण्याची संधी !

बाई म्हणाल्या ,"चला बरं गोष्ट कोण सांगणार ? आपण कितीतरी गोष्टी शिकलोय कि नाही ? अदिती, अथर्व ,ख़ुशी कोण येतं बरं गोष्ट सांगायला ?चल चिन्मय,तू सांग बरं गोष्ट !"

चिन्मय कसाबसा उठला ...उठला कसला ! त्याच्या आईने त्याला ढकललाच ..चिन्मय नावाची ही अडीच पावणेतीन फुटी मूर्ती ! पिवळा आडव्या रेघांचा टी शर्ट, हिरवी इलास्टिक ची चड्डी पोटावर गच्च बसलेली ,त्यातही कडक इन शर्ट केला होता साहेबांनी ! उठताना अडखळत उठला पण नंतर सावरून आमच्या बाजूला उभा राहीला .हाताची घडी घालून विवेकानंदांची पोज घेतली .सगळीकडे नजर फिरवली आणि गोष्ट सांगू लागला ....

" उत्तानपाद राजाला दोन राण्या होत्या .एकीचे नाव सुनीती आणि दुसरीचे नाव सुरुची .सुनीती चांगली होती ,दयाळू होती.सुरुची दुष्ट होती ...पण पट्टराणी होती ना ssssssss! ( हा ना जरा जास्तच लांब होता ) एकदा काय झालं !(बालप्रजेच्या डोळ्यात उत्कंठा तुडुंब भरली होती ) सुनितीचा मुलगा ध्रुव आणि सुरुचीचा मुलगा उत्तम राजा उत्तानपाद च्या मांडीवर बसले होते .तेवढ्यात सुरुची तिथे आली आणि तिनं ध्रुवाला राजाच्या मांडीवरून ओढून लांब ढकललं आणि ओरडली ,"तू राजाच्या मांडीवर आज्जिबात बसायचं नाही .तिथंफक्त माझा उत्तम बसणार !".सगळी चिमणी प्रजा गोष्ट मन लाऊन ऐकत होती. निवेदनाप्रमाणे चेहऱ्यावरचे भावही बदलत होते

" राजाला खूप वाईट वाटलं... ध्रुव त्याचा मुलगा होता ना!...पण काय करणार ? सुरुची पट्टराणी हो ना ssss ! " चिन्मयची आई च्या डोळ्यात लेकाचे कौतुक मावत नव्हते.कदाचित लेक गुणवत्ता यादीत आल्याचे एखादे सुप्त स्वप्न ही पाहत असावी बिचारी !चिन्मयची कथा धोधो वाहत होती

"ध्रुव रडत रडत आईकडे गेला ...आणि मग त्यानं काय केलं एक कावड घेतली आणि आपल्या आईबाबांना तिच्यात बसवलं आणि तो काशी यात्रेला निघाला ." स्टोरी ने अब बढिया टर्न लिया .आई टीचर अस्वस्थ झाल्या ...बाकीचे पालक खुदुखुदू हसू लागले .पण बालप्रजेची उत्सुकता कायम होती .टीचर चिन्मयची चड्डी ओढू लागली .पण मी थांबवलं त्यानं .बाकीच्या मुलांच्या सोबत मलाही ही नवी गोष्ट ऐकायची होती ना !...त्याला निवांत पणे मी गोष्ट सांगू दिली ....

"कावड मध्ये बसलेले आईबाबा त्याला म्हणाले ,बाळ आम्हाला पाणी देशील का रे ..तो हो बाबा म्हणाला ...मुलानो तुमच्या आईबाबांनी तुमच्याकडे पाणी मागितलंतर तुम्हीही हो म्हणायचं .आणि तांब्यात पाणी भरून भांडं आणायचं म्हणजे पाणी वाया जात नाही " टीचरने सांगितलेली गोष्ट जशीच्या तशी बाहेर पडत होती .मुलांनी लांबलचक होकारार्थी मन हलवली .

" तो तांब्या घेऊन नदीकडे गेला .त्यानं तांब्या पाण्यात बुडवला.डूब डूब असा आवाज आला .तेवढ्यात पलीकडून सुssssई करत बाण आला आणि त्याच्या पोटात घुसला " बाण पोटात घुसल्याची खात्री झाल्यावर चिन्मय गोष्ट पुढे नेऊ लागला ....

" आई ग ss! तो ओरडलेले पाहून राजा दशरथ आला आणि त्याला पडलेले पाहून रडू लागला ,"अरेरे हे मी काय केले रे बाळ!" रडू नका महाराज तिकडे माझे आई वडील आहेत त्यानं पाणी द्या ! एवढे म्हणून तो मेला ." ही नवी गोष्ट सर्व बालप्रजा मन लाऊन लक्ष देऊन ऐकत होती .चिन्मयची आई मात्र अस्वस्थ झाली .मला त्याचा आवेश खूप आवडला होता आणि बालप्रजेला वेगळी नवी गोष्ट !

"राजा दशरथ पाण्याचा तांब्या घेऊन आईबाबांच्या कडे गेला .बाबांनी रागाने त्याला विचारले , कुठे आहे तुझा देव ? तो नम्रपणे म्हणाला ,बाबा तो सगळी कडे आहे ..! बाबांनी रागाने विचारले .त्या भिंतीत आहे ? या खांबात आहे ?"

एक प्रचंड खसखस पालकात पसरली .मलाही हसू आवरेना टीचर आणि चिन्मयची आई हसण्याचा प्रयत्न करत होत्या .टीचरने सांगितलेल्या कितीतरी गोष्टी एका दमात सांगत होता बिचारा !

आलेल्या व्यत्ययाने बारकी मुलं नाराज झाली .एवढ्या सॉलिड गोष्टीला खुळ्यासारखे हसतात काय ? हाच भाव त्यांच्या डोळ्यात होता .ही नवीन गोष्ट त्याना भलतीच आवडली होती ..मला पण हं! चिन्मयने हातवारे करत मोठ्यांना शांत बसवले आणि गोष्ट सांगू लागला पण तेवढ्यात त्याची नजर आईच्या डोळ्यांकडे गेली आणि गोष्ट राजधानी एक्प्रेस ने पुढे सरकली ." त्याच्या बाबांनी खांबाला जोरात लाथ मारली.नरसिंह आला त्याने बाबांना आपल्या मांडीवर झोपवले ..आणि पोट फाडले ..आणि दुष्ट राजा मेला ...आणि संपली माझी गोष्ट !" म्हणत चिन्मय महर्षी मला आणि टीचरला नमस्कार करून जागेवर विराजमान झाले .

दुष्ट राणी पासून सुरु झालेली गोष्ट दुष्ट राजा मेल्यावर संपली .माझा दिवस सत्कारणी लागला .गोष्टींचं मस्त कोलाज पाहिलं नंतर भाषणात मी त्याच्या उत्स्फूर्त पणाचे,सभाधीटपणाचे कौतुक केले.आता घरी वर्गात नवीन गोष्ट सुरु होणार हेही लक्षात आले जरी चिन्मय म्हणाला असेल 'संपली माझी गोष्ट !

स्वाती ठकार( हा लेख 24-09-2007 च्या सकाळच्या मुक्तपीठ मध्ये प्रकाशित )

खरच संपली का गोष्ट !!!